रांची, 30 सितंबर 2026: झारखंड की आदिवासी संस्कृति और लोक संगीत से जुड़ी पारंपरिक मांदर को अब आधिकारिक पहचान मिल गई है। लोक उत्सवों, सामुदायिक आयोजनों और पारंपरिक समारोहों में बजाए जाने वाले मांदर को भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग प्रदान किया गया है।
यह जीआई टैग ज्योग्राफिकल इंडिकेशन रजिस्ट्री, चेन्नई की ओर से दिया गया है। इसके साथ झारखंड के पारंपरिक मांदर को राज्य की विशिष्ट भौगोलिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक पहचान से जोड़ा गया है।
क्या है मांदर?
मांदर झारखंड का एक पारंपरिक ताल वाद्य यंत्र है, जिसका इस्तेमाल लोकगीतों, आदिवासी नृत्यों और सामुदायिक समारोहों में किया जाता है। इसकी गूंज झारखंड की आदिवासी सांस्कृतिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
मांदर देखने में ढोल या ढोलक जैसा लग सकता है, लेकिन इसकी बनावट, निर्माण प्रक्रिया और ध्वनि इसे अलग बनाती है। इसके निर्माण में स्थानीय लाल मिट्टी और अन्य स्वदेशी कच्चे माल का इस्तेमाल किया जाता है। इसका एक हिस्सा मिट्टी से तैयार किया जाता है।
झारखंड की संस्कृति में क्या है मांदर की भूमिका?
मांदर केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि झारखंड की लोक और आदिवासी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका इस्तेमाल पारंपरिक नृत्य, लोकगीत, त्योहारों और सामुदायिक कार्यक्रमों में किया जाता है।
सरहुल, करमा जैसे पारंपरिक उत्सवों में मांदर की ताल पर सामूहिक नृत्य और गीत झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं।
लोक कलाकार नंदलाल नायक, जिन्होंने 2003 में आदिवासी कला और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के संरक्षण के लिए अभियान शुरू किया था, ने मांदर को “झारखंडी संगीत की धड़कनों में से एक” बताया है।

GI टैग मिलने में गुमला की रही अहम भूमिका
मांदर का जीआई टैग पूरे झारखंड के पारंपरिक मांदर को कवर करता है, लेकिन इसे हासिल करने की प्रक्रिया में गुमला की अहम भूमिका रही।
जीआई आवेदन रायडीह मांदर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड ने दायर किया था। यह गुमला के जरजट्टा गांव के मांदर कारीगरों का समूह है। आवेदन को झारखंड सरकार और जिला प्रशासन का सहयोग मिला।
जीआई आवेदन से जुड़े NUSRL, रांची के विजिटिंग फैकल्टी और बौद्धिक संपदा विशेषज्ञ सत्यदीप सिंह ने इसे गुमला और झारखंड के लिए गर्व का क्षण बताया।
मांदर को दूसरे वाद्य यंत्रों से अलग क्या बनाता है?
मांदर को अक्सर ढोल या ढोलक जैसा समझा जाता है, लेकिन इसकी बनावट और निर्माण प्रक्रिया अलग है।
पूर्व गुमला उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी, जिन्होंने अपने पूर्ववर्ती उपायुक्त सुशांत गौरव के साथ जीआई पंजीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया, के अनुसार इसकी विशिष्टता साबित करना सबसे बड़ी चुनौती थी।
इसकी विशेष बनावट, स्थानीय लाल मिट्टी, पारंपरिक निर्माण तकनीक और विशिष्ट ध्वनि इसे अलग पहचान देते हैं।
GI टैग के लिए किन प्रमाणों का इस्तेमाल हुआ?
मांदर की ऐतिहासिक और पारंपरिक पहचान को साबित करने के लिए कई दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया।
इनमें मानवशास्त्रियों शरत चंद्र राय, तारक चंद्र दास और डब्ल्यू. जी. आर्चर के कार्यों के साथ पटना संग्रहालय, बिहार जिला गजेटियर और अन्य ऐतिहासिक अभिलेख शामिल थे।
इन प्रमाणों से मांदर के झारखंड की स्थानीय संस्कृति और समुदायों से लंबे समय से जुड़े होने को सामने रखा गया।
क्या GI टैग सिर्फ गुमला के मांदर को मिला है?
नहीं। GI टैग पूरे झारखंड में बनाए जाने वाले पारंपरिक मांदर को मान्यता देता है। हालांकि, इसके आवेदन और मांदर की विशेष पहचान को दस्तावेजों में प्रस्तुत करने में गुमला के कारीगरों और प्रशासन की अहम भूमिका रही।
यह उपलब्धि पूरे झारखंड की पारंपरिक कला और सांस्कृतिक विरासत की मान्यता है।
GI टैग क्यों महत्वपूर्ण है?
GI टैग ऐसे उत्पाद को दी जाने वाली पहचान है जिसकी विशेष गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या विशेषताएं किसी खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती हैं।
मांदर को GI टैग मिलने से इसकी भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान औपचारिक रूप से दर्ज हुई है। इससे पारंपरिक कारीगरों, स्थानीय निर्माण परंपरा और झारखंड की लोक संस्कृति को व्यापक पहचान मिलने की संभावना है।
झारखंड के लिए मांदर सिर्फ संगीत का साधन नहीं, बल्कि लोक परंपरा, सामुदायिक जीवन और आदिवासी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। GI टैग के साथ इसकी पहचान अब आधिकारिक रूप से झारखंड से जुड़ गई है।
