लेस्लीगंज, तरहसी और मनातू में करीब 120 स्थानों पर हो रही पूजा, आस्था के साथ सामाजिक एकजुटता का भी प्रतीक बना दुर्गोत्सव
नीलाम्बर-पीताम्बरपुर (पलामू): दुर्गापूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत का भी उत्सव है। चुनाव के दौरान राजनीतिक विचारधाराओं और अलग-अलग नेताओं के समर्थन के कारण समाज कई खेमों में बंटा नजर आता है, लेकिन दुर्गापूजा के अवसर पर सजे पंडाल लोगों को एक मंच पर लाते हैं। यहां सभी वर्गों के लोग मिलकर आयोजन करते हैं और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता भी मां दुर्गा का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। पलामू जिले के नीलाम्बर-पीताम्बरपुर (लेस्लीगंज), तरहसी और मनातू प्रखंडों में दुर्गापूजा की व्यापकता सामाजिक जुड़ाव और सामूहिक भागीदारी की मिसाल पेश करती है।
85 साल से कायम है लेस्लीगंज में पूजा की परंपरा
नीलाम्बर-पीताम्बरपुर के पुराना बाजार में दुर्गापूजा का इतिहास करीब 85 वर्ष पुराना बताया जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, अंग्रेजों के शासनकाल में भी यहां दुर्गापूजा का पंडाल सजता था। आजादी से पहले शुरू हुई यह परंपरा आज भी श्रद्धा और उत्साह के साथ जारी है। वहीं, पहाड़ी गांव में भी करीब 69 वर्षों से दुर्गापूजा का आयोजन किया जा रहा है। इसके अलावा क्षेत्र में कई ऐसे पूजा स्थल हैं, जहां चार से पांच दशक से मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है।
समय के साथ दुर्गापूजा की यह परंपरा और व्यापक हुई है। वर्तमान में लेस्लीगंज प्रखंड में करीब 50, तरहसी में 40 और मनातू में 30 स्थानों पर पूजा समितियों की ओर से दुर्गोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस तरह तीनों प्रखंडों में लगभग 120 स्थानों पर मां दुर्गा की पूजा होती है। गांवों और बाजारों में सजने वाले पूजा पंडाल धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय संस्कृति, परंपरा और सामूहिक सहयोग की भावना को भी मजबूत करते हैं।
आस्था के मंच पर एकजुट होता है समाज
दुर्गापूजा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आयोजन में समाज के विभिन्न वर्गों के लोग अपनी भागीदारी निभाते हैं। पंडाल निर्माण, सजावट, रोशनी, साफ-सफाई और पूजा की व्यवस्था में स्थानीय लोग मिलकर सहयोग करते हैं। इससे लोगों के बीच आपसी मेलजोल बढ़ता है और सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं।
पूजा समितियों के आयोजन में अलग-अलग विचारधाराओं और सामाजिक पृष्ठभूमि के लोगों की भागीदारी इस पर्व को व्यापक सामाजिक स्वरूप देती है। धार्मिक आयोजन के दौरान लोग व्यक्तिगत और राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सामूहिक उत्सव का हिस्सा बनते हैं। यही वजह है कि दुर्गापूजा को सामाजिक एकजुटता और भाईचारे का प्रतीक भी माना जाता है।
पीढ़ियों से आगे बढ़ रही सांस्कृतिक विरासत
लेस्लीगंज, तरहसी और मनातू में दशकों से चली आ रही दुर्गापूजा की परंपरा स्थानीय सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बुजुर्गों से मिली परंपराओं को नई पीढ़ी आगे बढ़ा रही है। पूजा समितियों के माध्यम से युवा आयोजन की जिम्मेदारियां संभालते हैं और धार्मिक गतिविधियों के साथ सामाजिक सहभागिता का महत्व भी सीखते हैं।
पुराने पूजा स्थलों का इतिहास क्षेत्र के लोगों की आस्था और सामूहिक प्रयासों की कहानी कहता है। वर्षों से आयोजित हो रहे ये उत्सव गांवों और बाजारों की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इस प्रकार, दुर्गापूजा केवल देवी आराधना का पर्व नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने, आपसी सहयोग बढ़ाने और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम भी है। लेस्लीगंज में 85 वर्षों से कायम पूजा की परंपरा और तीनों प्रखंडों में लगभग 120 स्थानों पर होने वाले आयोजन इस सामूहिक आस्था की व्यापकता को दर्शाते हैं।