एथेनॉल से पानी का संकट
एथेनॉल उत्पादन के लिए भारी जल खपत ने खड़े किए कई अहम सवाल, क्या जल-संकट वाले देश में यह नीति टिकाऊ है?
भारत सरकार पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम करने और ऊर्जा आत्मनिर्भरता हासिल करने के उद्देश्य से एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम (E20) को तेजी से लागू कर रही है। सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में एथेनॉल आधारित ईंधन के उपयोग को और बढ़ाना है। लेकिन इस महत्वाकांक्षी योजना के साथ एक बड़ा सवाल भी जुड़ा हुआ है क्या यह पहल देश में पहले से मौजूद जल संकट को और गहरा कर देगी?
एथेनॉल उत्पादन में पानी की खपत को लेकर सामने आए आंकड़े चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि एथेनॉल उत्पादन की प्रक्रिया में सबसे अधिक पानी का उपयोग औद्योगिक स्तर पर नहीं, बल्कि फसलों की खेती और सिंचाई में होता है। यानी एथेनॉल का असली जल भार (Water Footprint) खेतों में पड़ता है।
कृषि में पानी की भारी खपत
भारत में एथेनॉल मुख्य रूप से गन्ना, धान (चावल) और मक्का जैसी फसलों से बनाया जाता है, जो अत्यधिक जल-आधारित हैं।
- धान आधारित एथेनॉल उत्पादन में एक लीटर एथेनॉल के लिए लगभग 10,000 लीटर पानी खर्च होता है।
- गन्ना आधारित एथेनॉल के लिए करीब 3,600 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।
- मक्का से एथेनॉल बनाने में लगभग 4,600 लीटर पानी लगता है।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि एथेनॉल उत्पादन में कुल जल खपत का सबसे बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र से आता है, जो पहले ही देश में जल संकट का प्रमुख कारण बना हुआ है।

औद्योगिक स्तर पर कम, लेकिन कुल खपत बहुत अधिक
आधुनिक एथेनॉल संयंत्रों में तकनीकी सुधार के कारण औद्योगिक प्रक्रिया में पानी की खपत अपेक्षाकृत कम हो गई है। एक लीटर एथेनॉल उत्पादन के लिए केवल 3 से 5 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। लेकिन जब इसमें फसल उत्पादन का पानी जोड़ा जाता है, तो कुल खपत हजारों लीटर तक पहुंच जाती है।
जल संकट की पृष्ठभूमि में बढ़ती चिंता
भारत पहले से ही गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। कई राज्यों में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, देश के 21 बड़े शहर वर्ष 2030 तक भूजल खत्म होने की कगार पर पहुंच सकते हैं। ऐसे में जल-गहन फसलों को बढ़ावा देना और उनसे एथेनॉल उत्पादन बढ़ाना भविष्य के लिए खतरनाक संकेत माना जा रहा है।
पर्यावरण और जल गुणवत्ता पर प्रभाव
एथेनॉल उत्पादन के दौरान ‘विनास’ (Vinasse) नामक अपशिष्ट भी निकलता है, जो यदि सही तरीके से प्रबंधित न किया जाए तो यह जल स्रोतों को प्रदूषित कर सकता है। इससे न केवल भूजल बल्कि आसपास की पारिस्थितिकी पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
नीतिगत सवाल और आगे की राह
सरकार की एथेनॉल नीति का उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा और आयात में कमी लाना है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इस दिशा में आगे बढ़ते समय जल संसाधनों की उपलब्धता और टिकाऊपन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अब बड़ा सवाल यह है कि:
- क्या भारत जैसे जल-संकट वाले देश में 100% एथेनॉल आधारित ईंधन व्यवहारिक है?
- क्या वैकल्पिक, कम पानी वाली फसलों या दूसरी तकनीकों पर ध्यान देना जरूरी नहीं है?
- क्या ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दौड़ में जल सुरक्षा को खतरे में डाला जा रहा है?
इन सवालों के जवाब तलाशना अब नीति निर्माताओं के लिए बेहद जरूरी हो गया है, ताकि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम रखा जा सके।