सुबह की पहली किरण जैसे ही पलामू के मनातू प्रखंड की पहाड़ियों पर गिरती है, उसी वक्त कुछ महिलाएं सिर पर लकड़ी के भारी गट्ठर उठाए, नंगे पांव, पत्थरों से भरे रास्तों पर चल पड़ती हैं। उनके कदम थके हुए हैं, लेकिन रुकते नहीं। क्योंकि हर कदम उनके बच्चों के भूख मिटाने की उम्मीद से जुड़ा है।
गौरवा-जशपुर के ये जंगल महिलाओं के जीवन का सहारा हैं। वहीं से मिलती है वो सूखी लकड़ी, जो बाजारों में चूल्हे को जलाए रखती है। 16 किलोमीटर का रास्ता, सिर पर 40 से 50 किलो का बोझ और कंधों पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी, यही है इनकी रोज़मर्रा की कहानी और जीने की जद्दोजहद।
मनातू बाज़ार पहुंचने तक सूरज सिर पर चढ़ आता है। धूप तपती है, पसीना बहता है, पर पसीने की धार की तरह इनकी हिम्मत नहीं टूटती। लकड़ी बेचने के बाद जो कुछ रुपये मिलते हैं, उनसे ही घर चलता है। चावल, नमक, तेल, साबुन, बच्चों के कपड़े। यही इनकी कमाई है और यही इनका संघर्ष है।
78 साल की आज़ादी के बाद भी, मनातू की इन महिलाओं के लिए “विकास” और आर्थिक सुधार अब भी एक सपना है। न सड़कें हैं, न रोज़गार, न शिक्षा का उजाला। जंगल ही उनका बैंक है, उनकी दुकान है, और उनका भविष्य भी जो शायद कुछ ही दिन चले।
झारखंड बनने के बाद से सरकारें बदलती रहीं, घोषणाएं हुईं, योजनाओं के कागज़ बने पर इनकी ज़िंदगी वैसी ही रही जैसी सालों पहले थी। हर सुबह वही सवाल “आज लकड़ी मिलेगी या नहीं? और अगर मिली, तो कितने में बिकेगी?” ऐसे में जंगल अगर सूख गया या उस पर प्रतिबंध लग गया, तो इन परिवारों के चूल्हे ठंडे पड़ जाएंगे।
पलामू का मनातू कोई अपवाद नहीं। झारखंड के कई प्रखंडों में यही तस्वीर दोहराई जाती रही है। ये महिलाएं उस भारत की सच्ची तस्वीर हैं, जो अब भी शहरों की चमक से बहुत दूर, जंगल की छाँव में अपनी ज़िंदगी ढो रही हैं। आर्थिक सशक्तिकरण और एक ठीक – ठाक जीवन सपनों से कोसों दूर है। वो लकड़ी के हर गट्ठर के साथ सिर्फ़ बोझ नहीं उठातीं, वो अपने घर की उम्मीद, अपने बच्चों के सपने औ भीर अपने अस्तित्व का संघर्ष भी ढोती हैं।
पलामू से द मॉर्निंग प्रेस के लिए जैलेश की रिपोर्ट