झारखंड हाथियों की संख्या और संरक्षण के लिहाज़ से एक महत्वपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र है। झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र में स्थित दलमा हाथी परियोजना देश का सबसे बड़ा हाथी आरक्षित क्षेत्र है। सिंहभूम के अलावा पलामू, लातेहार और गढ़वा में स्थित पलामू टाइगर रिज़र्व भी हाथियों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र है। वर्तमान में पूरे झारखंड में लगभग 700 हाथी रहते और विचरण करते हैं।
हाथी बड़े कद-काठी का जानवर है और इसकी प्रवृत्ति विचरण करने की होती है। इसी कारण वे पूरे भारत में लंबी दूरी तक यात्रा करते हैं। हाथियों के आवागमन और विचरण क्षेत्रों के अध्ययन के उपरांत भारत में कई हाथी गलियारों (एलीफेंट कॉरिडोर) की पहचान की गई है। झारखंड हमेशा से ही हाथियों के लिए एक हॉटस्पॉट रहा है।
परंतु बीते दस वर्षों में झारखंड में हाथियों की स्थिति काफी खराब हुई है और उनकी समस्याएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं। राज्य के लातेहार, गुमला, लोहरदगा, हजारीबाग, बोकारो, गिरिडीह, रामगढ़, चतरा और सिंहभूम क्षेत्रों में हाथियों और मानव आबादी के बीच टकराव चरम पर है।
झारखंड में हाथियों के लिए दो प्रकार के आवास चिन्हित किए गए हैं, एक स्थायी और दूसरा अस्थायी। हाथियों का विचरण क्षेत्र अस्थायी आवास में आता है। भोजन और पानी की तलाश में हाथी अक्सर जंगल से निकलकर गाँवों की ओर आ जाते हैं, जिससे घटनाओं में वृद्धि हो रही है। इस पारस्परिक संघर्ष में हाथियों के साथ-साथ मानव जीवन को भी भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
झारखंड से मध्य प्रदेश की ओर हाथियों का पलायन
झारखंड से सटे मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व क्षेत्र में हाल के वर्षों में हाथियों की संख्या अचानक बढ़ी है। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, मध्य प्रदेश के रीवा क्षेत्र में लगभग 100 हाथी पिछले कुछ वर्ष से रह रहे हैं। मध्य प्रदेश में पहले कभी हाथियों की स्थायी आबादी नहीं रही है। ये सभी हाथी झारखंड से बेहतर आवास की तलाश में छत्तीसगढ़ के रास्ते मध्य प्रदेश पहुँचे हैं।
मध्य प्रदेश सरकार हाथियों को वापस भेजने के बजाय उन्हें स्थायी रूप से बसाने का प्रयास कर रही है। बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व हाथियों को अनुकूल लग रहा है और वे लगातार इस क्षेत्र में रह रहे हैं। इसका मुख्य कारण यहाँ के शांत और समृद्ध जंगल हैं, जबकि झारखंड के जंगलों में मानवीय आबादी का दबाव अधिक है।

पलामू टाइगर रिज़र्व और सिंहभूम स्थित हाथी आरक्षित क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग बसे हुए हैं, जिन्हें अभी तक पुनर्वासित नहीं किया जा सका है, जबकि मध्य प्रदेश में यह कार्य पहले ही पूरा किया जा चुका है। वन्यजीव संरक्षण के दृष्टिकोण से यह झारखंड के लिए शुभ संकेत नहीं है और राज्य में चल रही विभिन्न संरक्षण परियोजनाओं पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
सिंहभूम क्षेत्र में हाथियों की संख्या में भारी गिरावट
झारखंड का सिंहभूम क्षेत्र जिसमें पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां जिले शामिल हैं—हाथियों के लिए संरक्षित माना जाता है। लेकिन जंगलों में भोजन की कमी के कारण हाथी अब जंगल से निकलकर गाँवों की ओर अधिक भटक रहे हैं। इस भटकाव के दौरान हाथियों के मौत की घटनाएँ भी बढ़ी हैं।
रांची-कोलकाता हाईवे पर बने हाथी अंडरपास अब प्रभावी नहीं रह गए हैं, क्योंकि इनके आसपास भारी आबादी बस गई है। दलमा हाथी अभ्यारण्य के आसपास बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य हो रहे हैं, जिससे हाथियों के संरक्षण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

भारत की पहली देशव्यापी डीएनए-आधारित हाथी जनगणना रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड में जंगली हाथियों की आबादी पिछले आठ वर्षों में लगभग 68 प्रतिशत तक कम हो गई है, जो हाथियों के आवासों के तेजी से क्षरण को दर्शाता है। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, देहरादून द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड में वर्तमान में हाथियों की संख्या लगभग 217 आंकी गई है, जबकि वर्ष 2017 में यह संख्या 679 थी। हाथियों की गिरती आबादी को लेकर देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों ने रिपोर्ट प्रकाशित की है।
विशेषज्ञों की राय और पानी की समस्या
पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. डी. के. श्रीवास्तव के अनुसार, वन विभाग की लापरवाही के कारण झारखंड में हाथियों का संरक्षण प्रभावी ढंग से नहीं हो पा रहा है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों द्वारा अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
पलामू टाइगर रिज़र्व क्षेत्र से हाथियों के पलायन की एक मुख्य वजह पानी की समस्या है। औसत वर्षा में कमी के कारण गर्मियों के दौरान जल संकट गंभीर हो जाता है, जबकि जल की उपलब्धता हाथियों को अत्यधिक आकर्षित करती है। यही कारण है कि इस क्षेत्र के हाथी मध्य प्रदेश की ओर पलायन कर रहे हैं। डॉ. श्रीवास्तव का यह भी कहना है कि झारखंड के हाथी केवल मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र तक पलायन कर रहे हैं। हालांकि, हाथियों के इस पलायन को ट्रैक करने के लिए वन विभाग के पास कोई ठोस व्यवस्था नहीं है।

पलामू टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर कुमार आशीष ने बताया कि पीटीआर में मंडल डैम परियोजना को पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है। मंडल डैम के निर्माण से यहां सालों भर पानी की उपलब्धता रहेगी। उन्होंने बताया कि पलामू टाइगर रिजर्व में औसत वर्षा एक हजार मिलीमीटर से भी कम है जिस कारण यहां पानी की समस्या है। खासकर गर्मियों में पानी की किल्लत और अधिक बढ़ जाती है। कई मौकों पर वन विभाग गर्मी के मौसम में टैंकर के जरिए जंगल में पानी की व्यवस्था करता है। इस पूरे क्षेत्र में बूढ़ा नदी ही एक मात्र पानी का बड़ा स्रोत है लेकिन अवैध खनन के कारण इसके जलस्तर में भारी कमी हो गई है। गर्मियों के समय यह नदी पूरी तरह सूख जाती है। जबकि इसके उलट मध्य प्रदेश के जंगलों में पानी की समस्या नहीं है।
माइनिंग: पलायन का एक बड़ा कारण
हाथियों के पलायन और मध्य प्रदेश में उनके बसने के संदर्भ में वहाँ के वन अधिकारियों से भी बातचीत की गई। वर्तमान में संजय टाइगर रिज़र्व में पदस्थापित सुधीर देशमुख ने बताया कि वर्ष 2018 के बाद मध्य प्रदेश में हाथियों की संख्या सौ से अधिक हो गई है और वे अब यहाँ स्थायी रूप से रह रहे हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ और झारखंड में हो रही माइनिंग गतिविधियों को इसका प्रमुख कारण बताया।
सरकार समर्थित और अवैध—दोनों प्रकार की माइनिंग वन्यजीवों पर गंभीर प्रभाव डाल रही है। नेतरहाट क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकार वसीम अख्तर ने बताया कि पलामू टाइगर रिज़र्व से सटे इलाकों में हिंडालको द्वारा बड़े पैमाने पर बॉक्साइट खनन किया जा रहा है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ के सामरी और बड़गड़ क्षेत्रों में भी माइनिंग गतिविधियाँ जारी हैं।
पीटीआर से सटे सिरसा क्षेत्र के स्थानीय पत्रकार मोहम्मद निज़ाम ने बताया कि इलाके में लगभग बारह माइनिंग स्पॉट हैं, जहाँ भारी ब्लास्टिंग की जाती है, जो निश्चित रूप से वन्यजीवन को प्रभावित करती है। वर्तमान में हिंडालको और बालाजी टाइल्स मार्बल कंपनी यहाँ खनन कर रही हैं, जिनमें हिंडालको का हिस्सा सबसे बड़ा है।
उन्होंने बताया कि कुछ वर्ष पहले तक इस क्षेत्र में हाथियों का नियमित आवागमन होता था, लेकिन अब यह पूरी तरह बंद हो चुका है। छत्तीसगढ़ में हाथी कभी स्थायी रूप से नहीं रहे—ये सभी हाथी मूल रूप से पलामू टाइगर रिज़र्व क्षेत्र के थे, जिनका पलायन मध्य प्रदेश की ओर हो गया है। झारखंड से छत्तीसगढ़ होते हुए मध्य प्रदेश तक हाथियों का एक प्राकृतिक कॉरिडोर मौजूद है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से हाथियों ने वापस आना बंद कर दिया है और उन्हें मध्य प्रदेश के जंगल अधिक अनुकूल लग रहे हैं।
झारखंड को ठोस कदम उठाने की आवश्यकता
हाथियों की गिरती संख्या और उनका बढ़ता पलायन झारखंड के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है, जिस पर तत्काल चर्चा और ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है। हाथियों के पलायन से लेकर उनकी मौतों तक, हर स्तर पर प्रभावी कदम उठाने होंगे। झारखंड के जंगल प्राकृतिक रूप से समृद्ध हैं, लेकिन बढ़ती मानवीय गतिविधियाँ और सरकार का ढीला-ढाला रवैया हाथियों के संरक्षण में सबसे बड़ी बाधा बनते जा रहे हैं।