(रिपोर्ट – जैलेश)
पलामू जिले के तरहसी अंचल अंतर्गत टीरवा गांव में भूमि रजिस्ट्री से जुड़ा एक चौंकाने वाला फर्जीवाड़ा मामला फिर सुर्खियों में है। आरोप है कि वर्ष 1999 में समुद्री देवी नामक महिला के नाम से 4.52 एकड़ जमीन की रजिस्ट्री की गई, जबकि इस बात का कोई विश्वसनीय प्रमाण मौजूद नहीं है कि उस समय समुद्री देवी जीवित थीं भी या नहीं।
जगा पांडेय की विरासत को पांच बेटियों में बांटा गया
टीरवा निवासी स्वर्गीय जगा पांडेय के नाम पर कुल 24 एकड़ जमीन थी। उनकी पांच बेटियाँ थीं और सभी की शादी उनके जीवनकाल में हुई। जगा पांडेय की मृत्यु के बाद उनकी तीसरी बेटी समुद्री देवी अपनी मां की सेवा में रहीं। इसी आधार पर वर्ष 1980 में ‘बकसीसनामा केवाला’ के माध्यम से मां ने 4.52 एकड़ भूमि समुद्री देवी को हस्तांतरित कर दी।
शेष 19.48 एकड़ भूमि बाद में पांचों बहनों और उनके बेटों ने अपने हिस्से के अनुसार बेच दी।
4.52 एकड़ जमीन बनी विवाद की जड़
समुद्री देवी को दी गई जमीन ही वर्तमान विवाद का कारण है। बड़ी बहन के बेटे बैजनाथ शुक्ला (कमलकेडिया, लेस्लीगंज) ने अदालत में दावा किया कि:
“मां को पांच बेटियों में से सिर्फ एक को 4.52 एकड़ जमीन देने का अधिकार नहीं था।”
सिविल कोर्ट (टाइटल) ने इस दलील को खारिज कर दिया और बैजनाथ शुक्ला मुकदमा हार गए।
एडिशनल कमिश्नर का विवादास्पद आदेश
इसके बाद बैजनाथ शुक्ला ने क्रेता नवल पांडेय के नाम कटी हुई जमाबंदी को रद्द कराने हेतु एडिशनल कलेक्टर/कमिश्नर के पास अर्जी दी।
एडिशनल कमिश्नर ने अपने अधिकार क्षेत्र से परे जाते हुए जमाबंदी स्थगित करने का आदेश जारी कर दिया। इस आदेश को अब संदिग्ध माना जा रहा है और कई गंभीर प्रश्न उठाए जा रहे हैं।
1999 की रजिस्ट्री पर तीन बड़े सवाल
1. क्या 1999 में समुद्री देवी जीवित थीं?
किसी भी पक्ष के पास इसका कोई प्रमाण नहीं है—
- न मृत्यु प्रमाणपत्र
- न जीवित होने का अभिलेख
यही इस मामले की सबसे बड़ी कानूनी कमजोरी मानी जा रही है।
2. यदि समुद्री देवी पहले ही मृत थीं, तो रजिस्ट्री किसने करवाई?
यह सवाल पूरे प्रकरण को फर्जीवाड़े की ओर संकेत करता है।
- क्या कोई व्यक्ति समुद्री देवी बनकर रजिस्ट्री कराने गया?
- क्या स्थानीय तंत्र की मिलीभगत थी?
3. यदि रजिस्ट्री फर्जी थी, तो 16 साल तक बैजनाथ शुक्ला चुप क्यों रहे?
1999 से 2015 तक
- न कोई आपत्ति
- न शिकायत
- न खेत पर कब्जे का विरोध
- न म्यूटेशन के समय विरोध
इस दौरान जमीन पर खेती-कटाई भी जारी रही। यह चुप्पी दावा कमजोर करती है।
कहां अटका मामला? कौन-कौन सवालों के घेरे में?
- क्रेता नवल पांडेय की रजिस्ट्री पर फर्जीवाड़े का संदेह।
- एडिशनल कलेक्टर का अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश देना चर्चा में।
- बैजनाथ शुक्ला द्वारा 16 वर्षों बाद आपत्ति उठाना और पहले अदालत में हारना उनके दावे को कमजोर करता है।
ग्रामीणों की प्रतिक्रिया
ग्रामीण—बिनोद पांडेय, रविंद्र पांडेय, नागेंद्र पांडेय, दिनेश सिंह, नवल पांडेय, विपिन पांडेय, प्रसाद शर्मा समेत कई लोगों ने सवाल उठाए हैं—
“यदि रजिस्ट्री फर्जी थी तो 16 वर्षों तक चुप्पी क्यों रही? जमीन पर खेती किसने की? टैक्स कौन देता था?”
ग्रामीणों का मानना है कि यह पूरा प्रकरण विस्तृत जांच की मांग करता है।
निष्कर्ष
टीरवा गांव की 4.52 एकड़ जमीन पर उठा विवाद
- पारिवारिक विरासत,
- कानूनी अधिकारों,
- और भूमि रजिस्ट्री में संभावित फर्जीवाड़े
का जटिल मिश्रण है।
1999 की रजिस्ट्री की सच्चाई सामने लाने के लिए जरूरी है कि
- समुद्री देवी की जीवित/मृत स्थिति
- रजिस्ट्री के मूल दस्तावेज
- गवाहों एवं पहचान पत्रों की जांच
- स्थानीय प्रशासन की भूमिका की न्यायिक जांच कराई जाए, ताकि सच सामने आ सके।