लगातार बारिश ने किसानों को पहले ही बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया है। मकई, अरहर, तिल, उरद, बरई और सूर्यमुखी जैसी भदई फसलें खेतों में ही सड़ गईं। किसानों को उम्मीद थी कि धान की फसल कुछ सहारा देगी, लेकिन अब खाद की कालाबाज़ारी और दुकानदारों की मनमानी ने उनकी मुसीबत और बढ़ा दी है।
किसानों का आरोप है कि स्थानीय खाद-बीज दुकानदार उन्हें राहत देने के बजाय यूरिया खाद की जमाखोरी कर ऊंचे दामों पर बेच रहे हैं। सरकारी दर 266 रुपये प्रति बोरा होने के बावजूद दुकानदार इसे 550 रुपये में थमा रहे हैं। विरोध या मोलभाव करने पर किसानों को खाद देने से ही इंकार कर दिया जाता है।
किसान अभिनव कुमार सिंह, नकुल सिंह, बनारस सिंह, राजेन्द्र दुबे, मदन मांझी और तारकेश्वर पासवान समेत कई ग्रामीणों ने बताया कि “प्रशासन की चुप्पी ने दुकानदारों के हौसले बुलंद कर दिए हैं। खाद के बिना धान की फसल चौपट हो रही है और किसान कर्ज व भूख से कराह रहा है।”
ग्रामीण किसान रामलाल चौधरी ने कहा,
“बारिश से धान और मक्का की पूरी फसल बर्बाद हो गई। अब घर चलाने के लिए हम बाजार पर निर्भर हैं, मगर दुकानदार मनमाना दाम वसूल रहे हैं। कहां जाएं? कौन सुने हमारी?”
इसी तरह सावित्री देवी ने पीड़ा जाहिर करते हुए कहा,
“तेल और सब्जी इतनी महंगी हो गई कि बच्चों को दो वक्त की रोटी देना मुश्किल है। बारिश ने पेट काटा और कालाबाज़ारी ने जिंदा रहना दूभर कर दिया।”
गांव-गांव में हाहाकार
हालात इतने गंभीर हैं कि ग्रामीण इलाकों में किसान हताश हो चुके हैं। न तो सरकार की ओर से कोई ठोस राहत पहल दिख रही है और न ही प्रशासन कालाबाज़ारी पर रोक लगा पा रहा है।
किसानों ने मांग की है कि प्रशासन तत्काल छापेमारी कर कालाबाज़ारी बंद कराए और खाद-बीज उचित दर पर उपलब्ध कराए, वरना आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ सकते हैं।