जब ‘चिरैया’ की पूजा ने कहा “मैं कोई चीज़ नहीं हूँ”, तो वह सिर्फ एक किरदार नहीं बोल रही थी। वह उन करोड़ों औरतों की आवाज़ थी जो अपने ही घर में अदृश्य हैं। आजकल सोशल मीडिया पर एक रील बहुत ट्रेडिंग है – “आखिर चाहिए क्या एक औरत को?” लोग हँसते हैं, मज़ाक उड़ाते हैं, टिप्पणियाँ करते हैं। लेकिन जब यही सवाल किसी औरत की ज़िंदगी के आईने में देखा जाए, तो जवाब न मज़ाक है, न चलन, वह एक दर्द है जो पीढ़ियों से चला आ रहा है।
एक औरत जब छोटी बच्ची होती है, तो वह अपनी माँ को देखकर बड़ी होती है। माँ की हर हरकत में एक पाठ होता है – चुप रहना, सहना, घर को सँभालना, सबकी ज़रूरतें पूरी करना। बच्ची सोचती है, “मुझे भी बड़े होकर पूरे घर की ज़िम्मेदारी ऐसे ही उठानी है।” लेकिन बड़े होते-होते वही बच्ची उस काले सच से टकराती है जिसे उसकी माँ ने रात के अँधेरों में आँसू बनाकर बहा दिया था। तब उसे समझ आता है, माँ संस्कारी नहीं थी, माँ पीड़ित थी। और उस पहचान से जन्म लेती है एक आग, जो इस पूरे समाज को जला देने के लिए काफी है।
इसी वर्ष एक वेब धारावाहिक चिरैया ने वह सवाल उठाया जिससे हमारा समाज सदियों से मुँह फेरता आया है – क्या विवाह के बाद औरत की सहमति का कोई अर्थ नहीं रहता? जब पूजा के पति ने उस पर अपनी इच्छा थोपी, तो उसकी जेठानी कमलेश ने उसे “घर का मामला” कहकर दबा दिया। पूजा का जवाब सरल था – “मैं कोई चीज़ नहीं हूँ, मुझे खरीदा नहीं गया था।” यह तीन शब्द किसी काल्पनिक किरदार के नहीं, यह उन लाखों औरतों की आवाज़ है जो अपने ही कमरे में असुरक्षित हैं, और जिनके लिए हमारा कानून आज भी न्याय नहीं कर पाता।
आज की औरतें एक ऐसी ज़िंदगी चाहती हैं जिसमें थोड़ा वक्त उनके अपने लिए भी हो। उन्हें अपने सपने जीने और पूरे करने हैं क्योंकि उन्होंने अपनी माँ की आँखों में उनके सपनों की लाश देखी है। वह ख़ामोश दर्द, वह अधूरी इच्छाएँ, यह सब देखकर इस पीढ़ी की औरतें हिम्मत बाँध रही हैं। वह हिम्मत कोई विद्रोह नहीं, वह आत्मसम्मान है। धर्म, रीति-रिवाज और संस्कार के नाम पर जो प्रताड़ना इस युग के आरंभ से औरत झेलती आई है, उसकी गिनती करने बैठें तो अंक कम पड़ जाएँ। और इतना सब झेलने के बाद भी समाज कहता है – “औरत तो बस घर और बच्चे सँभालने के लिए होती है।”
एक औरत की ज़िंदगी के बारे में ज़रा सोचिए। हर महीने पाँच दिन माहवारी के, उन दिनों में भी घर की ज़िम्मेदारी नहीं रुकती। वह अपनी हड्डियों का कैल्शियम दूध में बदलकर अपने बच्चे का पेट भरती है। न जाने कितने दिनों की नींद बच्चों की परवरिश में गँवाती है। अपना जीविका-पथ बीच में छोड़ती है, फिर वापस लौटने की कोशिश करती है। भावनाओं से भरी होती है, जिसे दुनिया “अति-संवेदनशील” कहकर नकार देती है। और यह सब करने के बाद उसे मिलता क्या है? “कब तक औरत ऐसी ज़िंदगी जिएँगी जहाँ वो ही नहीं होती – बाकी सब होते हैं।”
औरत की पूरी ज़िंदगी अलग-अलग किरदार निभाने में निकल जाती है – बेटी, बहन, बहू, पत्नी, माँ, दादी। हर किरदार में वह दूसरों के लिए जीती है। उसकी अपनी ज़िंदगी है, यह वह भूल ही चुकी होती है। हमारे समाज की सबसे बड़ी विडंबना यही है – एक तरफ हम औरत को देवी कहते हैं, नवरात्रि में पूजते हैं, पैर छूते हैं। और दूसरी तरफ उसी औरत के चरित्र पर एक दाग लगते ही उसे जीने नहीं देते। उसकी वेशभूषा पर सवाल उठाते हैं। उसके घर से बाहर निकलने पर ताने मारते हैं। यह हमारे हर घर का सच है। देवी कहने में और मानने में बहुत फर्क होता है। एक सभ्य समाज की कल्पना सिर्फ औरत पर ही आधारित क्यों?
बस इतना चाहिए एक औरत को:
एक ऐसा समाज जिसमें उसके लिए पाबंदियाँ नहीं, उड़ने को पंख हों।
एक परिवार जो उसे कामयाब होते देखना चाहे, न कि केवल एक अच्छे घर की बहू। एक ससुराल जहाँ उसे घर की नौकरानी, बेटे की पत्नी और पोतों की माँ के रूप में नहीं, बल्कि एक इंसान के रूप में देखा जाए। एक हमसफर जो उसे उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि एक इंसान समझे ।
एक ज़िंदगी जिसमें उसके अपने फ़ैसले हों, उसकी अपनी पहचान हो, और जहाँ उसे अपने औरत होने पर पछतावा नहीं, गर्व हो।
बात तो बस इतनी सी है कि एक औरत को औरत समझा जाए। यह समझा जाए कि वह कोई मशीन नहीं ,एक जीता-जागता इंसान है जो समाज के दायरे में बंधकर, उलझकर, एक दिन दम तोड़ देती है।
चिड़ैया की पूजा ने कहा था, “मैं चीज़ नहीं हूँ।” यह कोई क्रांति का नारा नहीं था, यह एक बुनियादी सच्चाई थी जिसे हमें अभी तक मानना बाकी है।