भारत में अमेरिकी डेयरी उत्पादों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। मुद्दा है तथाकथित ‘नॉन-वेज मिल्क’, जिसे लेकर भारत सरकार ने सांस्कृतिक और धार्मिक चिंताओं का हवाला देते हुए अमेरिकी डेयरी उत्पादों के आयात की अनुमति देने से इनकार किया है।
जुलाई 2025 में प्रकाशित बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार का मानना है कि देश की बड़ी शाकाहारी आबादी के लिए ऐसे दूध का सेवन धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं है। भारत में कई लोग उन गायों के दूध को स्वीकार्य नहीं मानते, जिन्हें मांस या जानवरों के अवशेषों से बने चारे खिला कर पाला जाता है। इसी तरह के दूध को ‘नॉन-वेज मिल्क’ कहा जाता है। अमेरिका के डेयरी उद्योगों में गायों का वज़न तेजी से बढ़ाने के लिए विशेष प्रकार का मांसाहारी चारा दिया जाता है, जिसमें जानवरों का मांस, ख़ून और फैट शामिल होता है। इस चारे को आमतौर पर ‘ब्लड मील’ भी कहा जाता है।
सिएटल टाइम्स के एक लेख में दावा किया गया है कि गायों को दिए जाने वाले इस चारे में सुअर, मछली, चिकन, घोड़े और यहां तक कि बिल्लियों व कुत्तों के मांस के अवशेष भी शामिल रहते हैं। इसके अलावा, प्रोटीन की पूर्ति के लिए सुअर और घोड़े का ख़ून तथा मोटापा बढ़ाने के लिए जानवरों की चर्बी का इस्तेमाल किया जाता है।
बीबीसी न्यूज़ हिंदी की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, ‘ब्लड मील’ मीट पैकिंग उद्योग का बाई-प्रोडक्ट होता है। जानवरों को मारने के बाद उनके ख़ून को जमा कर सुखाया जाता है और फिर उसे पशु आहार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
भारत सरकार का कहना है कि इस तरह के चारे से प्राप्त दूध भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाओं के अनुकूल नहीं है। इसी कारण अमेरिकी डेयरी उत्पादों के आयात को लेकर कड़ा रुख अपनाया गया है और यह मुद्दा भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं में भी चर्चा का विषय बना हुआ है।