जलेश शर्मा, पलामू
एक समय था जब पलामू, चतरा और लातेहार के मनातू, पांकी, पीपरा टांड़, लावालौंग, प्रतापपुर, हंटरगंज और हेरहंज जैसे इलाकों में नक्सली गोलियों की गूंज सुनाई देती थी। आज बंदूकें खामोश हैं, लेकिन उन्हीं जंगलों में एक नई और खतरनाक फसल लहलहा रही हैअवैध पोस्ता। यह महज अवैध खेती नहीं, बल्कि एक समानांतर अर्थव्यवस्था का रूप ले चुकी है, जो धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र को अपनी गिरफ्त में ले रही है।
गरीबी की मार या मुनाफे का जाल?
स्थानीय किसानों और प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, पोस्ता खेती की ओर झुकाव के पीछे कई कारण हैं। पारंपरिक खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा बन चुकी है। धान, मक्का या दलहन की तुलना में पोस्ता से 8 से 10 गुना तक अधिक मुनाफा मिलता है।
सिंचाई व्यवस्था की बदहाली, सूखी नहरें और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का लाभ ज़मीन तक न पहुंचना किसानों की मजबूरी को और बढ़ा देता है। वहीं, बिचौलियों और संगठित गिरोहों का मजबूत नेटवर्क बीज से लेकर सुरक्षा और खरीद तक की पूरी व्यवस्था उपलब्ध कराता है। दुर्गम जंगलों, सीमित पुलिस बल और कमजोर निगरानी ने इस अवैध कारोबार को और हवा दी है।
एक स्थानीय किसान की पीड़ा इस सच्चाई को उजागर करती है“सरकार पेट नहीं भरती, पोस्ता भर देता है।”
नक्सलवाद के बाद अफीमवाद: नई चुनौती
सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समस्या केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है। पोस्ता से तैयार हेरोइन की सप्लाई चेन अंतरराज्यीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैली होने की आशंका है। नेपाल, म्यांमार और अंतरराष्ट्रीय ड्रग रूट से इसके कनेक्शन की जांच चल रही है। ड्रग मनी के जरिए संगठित अपराध, हथियारों की खरीद और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को फंडिंग मिलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के बाद क्या ड्रग माफिया ने इस क्षेत्र को अपना नया ठिकाना बना लिया है?
कार्रवाई बढ़ी, लेकिन खेती भी
पुलिस-प्रशासन के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में कार्रवाई लगातार तेज हुई है, फिर भी पोस्ता खेती का रकबा घटने के बजाय बढ़ता गया।
2020: लगभग 350 हेक्टेयर खेती नष्ट, 210 केस, 180 गिरफ्तारियां
2021: लगभग 420 हेक्टेयर, 260 केस, 215 गिरफ्तारियां
2022: लगभग 510 हेक्टेयर, 320 केस, 270 गिरफ्तारियां
2023: लगभग 680 हेक्टेयर, 410 केस, 330 गिरफ्तारियां
2024: 800 हेक्टेयर से अधिक, 500 से ज्यादा केस, 400 से अधिक गिरफ्तारियां
चिंताजनक तथ्य यह है कि हर साल कार्रवाई बढ़ने के बावजूद अवैध खेती का फैलाव थमता नहीं दिख रहा।
ड्रोन और सैटेलाइट से निगरानी
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अब पुलिस और प्रशासन ने रणनीति बदली है। ड्रोन सर्वे और सैटेलाइट इमेजरी के जरिए जंगलों की निगरानी की जा रही है। STF और जिला पुलिस की संयुक्त टीमें बनाई गई हैं तथा सीमावर्ती जिलों के बीच इंटेलिजेंस साझा किया जा रहा है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का कहना है,“अब केवल खेत नहीं, पूरे नेटवर्क को तोड़ा जाएगा।”
समाधान पुलिस से आगे, नीति तक
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान केवल पुलिस कार्रवाई से संभव नहीं है। इसके लिए ठोस नीति और सामाजिक सहभागिता जरूरी है। सरकारी स्तर पर वैकल्पिक फसल योजनाएं जैसे औषधीय पौधे, तसर और लाख सुनिश्चित खरीद और उचित समर्थन मूल्य के साथ लागू करनी होंगी। सिंचाई, सड़क कनेक्टिविटी और ग्राम स्तर पर निगरानी समितियां भी अहम भूमिका निभा सकती हैं। वहीं, स्वयंसेवी संगठनों द्वारा नशामुक्ति अभियान, किसानों को वैकल्पिक आजीविका का प्रशिक्षण, युवाओं को कौशल विकास से जोड़ना और महिला समूहों के माध्यम से सामाजिक दबाव बनाने के प्रयास कुछ इलाकों में सकारात्मक परिणाम दे रहे हैं।