रिपोर्ट:नंद किशोर मंडल, पाकुड़
गरीबी जब हदें पार कर जाती है, तब इंसान अपने घर-द्वार, गांव-प्रदेश सब कुछ छोड़ने को मजबूर हो जाता है। पेट की आग बुझाने और बच्चों का लालन-पालन आज कई गरीब परिवारों के लिए सबसे बड़ी जंग बन चुका है। ऐसी ही मजबूरी मध्य प्रदेश के कुछ गरीब परिवारों को सैकड़ों किलोमीटर दूर झारखंड के पाकुड़ जिले तक खींच लाई है।
मध्य प्रदेश के सागर जिले से आए ये परिवार रोजगार की तलाश में पाकुड़ पहुंचे हैं। लोहे के औजार बनाना ही इनका पारंपरिक पेशा है। टांगी, हसुआ, खुरपी, छेनी जैसे कृषि और घरेलू उपयोग के औजार बनाकर वे अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं। रोजगार की उम्मीद लेकर इन लोगों ने हिरणपुर बाजार स्थित डाकबांग्ला परिसर में खुले आसमान के नीचे टेंट लगाकर अपना ठिकाना बनाया है।
कड़ाके की ठंड में महिलाएं, पुरुष और मासूम बच्चे करीब 18 से अधिक लोग यहीं रात गुजारने को मजबूर हैं। दिनभर पुरुष और महिलाएं कमर तोड़ मेहनत कर लोहे के औजार तैयार करते हैं, लेकिन बाजार में बिक्री अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो पा रही है। हालात ऐसे हैं कि मेहनत के बाद भी दो वक्त की रोटी जुटाना इनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
परिवार की महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं, फिर भी हालात नहीं सुधर रहे। बच्चों के चेहरे पर मासूमियत है, लेकिन आंखों में अनकहा दर्द झलकता है। ठंड से ठिठुरती रातें, खुले आसमान तले सोना और भूख यही इनकी रोजमर्रा की हकीकत बन चुकी है।
टीम में शामिल लोगों का कहना है कि मध्य प्रदेश में उनका घर तो है, लेकिन रोजगार नहीं। पेट पालने और परिवार चलाने के लिए उन्हें झारखंड आना पड़ा। यहां थोड़ी-बहुत राहत जरूर मिली है, लेकिन हालात अब भी बेहद कठिन हैं।
हिरणपुर के डाकबांग्ला परिसर में खुले आसमान के नीचे पल रही यह मजबूरी भरी जिंदगी न सिर्फ व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह भी बताती है कि आज भी देश में हजारों परिवार सिर्फ दो वक्त की रोटी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।