नीलांबर-पितांबरपुर: लेस्लीगंज हाई स्कूल के संस्थापक एवं प्रथम प्रधानाचार्य स्वर्गीय रमा वल्लभ तिवारी की सातवीं पुण्यतिथि बुधवार को विद्यालय परिसर तथा पेंशनर भवन में श्रद्धा के साथ मनाई गई।
विद्यालय परिसर में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में शिक्षक, छात्र-छात्राएँ और विद्यालय परिवार के सदस्य बड़ी संख्या में उपस्थित हुए। कार्यक्रम की शुरुआत तिवारी जी के चित्र पर माल्यार्पण और दो मिनट के मौन के साथ हुई।
हर वर्ष की तरह इस बार भी तिवारी जी के परिजनों द्वारा विद्यालय की कमजोर और मेधावी छात्राओं के लिए ₹11,000 की सहायता राशि प्रदान की गई। इस सहयोग से छात्राओं के चेहरों पर खुशी झलक उठी। उनके पुत्र सतीश तिवारी और अजीत तिवारी ने भावुक होते हुए कहा कि उनके पिता शिक्षा को समाज उत्थान का सर्वोत्तम माध्यम मानते थे। वह हमेशा कहते थे— “बेटियाँ पढ़ेंगी तभी समाज आगे बढ़ेगा।” इसी विचार को जीवित रखने हेतु यह परंपरा जारी है ताकि कोई भी प्रतिभा आर्थिक अभाव के कारण न रुके।
विद्यालय के प्राचार्य अमरेश सिंह ने कहा कि तिवारी जी केवल प्रधानाचार्य नहीं, बल्कि विद्यालय की आत्मा थे। कठिन परिस्थितियों में उन्होंने स्कूल की नींव रखी, कक्षाएँ बनवाईं और विद्यार्थियों में अनुशासन व संस्कार स्थापित किए। आज विद्यालय की जो पहचान है, वह उनके समर्पण और दूरदर्शिता का ही परिणाम है।
कार्यक्रम में मौजूद शिक्षकों ने तिवारी जी के व्यक्तित्व और योगदान पर संस्मरण सुनाए। छात्रों द्वारा उनके आदर्शों पर आधारित भाषण और कविताएँ प्रस्तुत की गईं, जिससे वातावरण भावुक हो उठा। अंत में सभी ने उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया।
पेंशनर समाज ने भी दी भावपूर्ण श्रद्धांजलि
लेस्लीगंज पेंशनर भवन में पेंशनर समाज की प्रखंड इकाई ने जिला अध्यक्ष जो बलराम और प्रखंड अध्यक्ष आनंद किशोर सिंह की उपस्थिति में तिवारी जी की पुण्यतिथि सादगीपूर्ण और सम्मान के साथ मनाई। वक्ताओं ने बताया कि तिवारी जी प्रखंड पेंशनर समाज के प्रथम अध्यक्ष भी रहे थे।
अमरजीत शुक्ला, शिवसागर मिस्त्री, मुंद्रिका पासवान, प्रमोद सोनी, बागेश्वर माझी, मोहम्मद सुलेमान, मोहम्मद कमल, मोहम्मद अलीमुद्दीन, प्यारी राम, राजेंद्र दुबे, अंबिका पासवान, मोहन राम, मदन राम सहित अनेक सदस्य उपस्थित रहे।
वक्ताओं ने कहा कि स्व. तिवारी जी ईमानदारी, सादगी और अनुशासन की मिसाल थे। शिक्षक जीवन से लेकर सेवानिवृत्ति के बाद तक वे समाज सेवा, शिक्षा के उत्थान और जरूरतमंदों की सहायता में सक्रिय रहे।
एक वरिष्ठ पेंशनर ने भावुक होकर कहा—
“तिवारी जी का जीवन स्वयं में एक पाठशाला था। उनके जाने से पैदा हुआ खालीपन कभी नहीं भर सकता।”
सभा के अंत में सभी ने उनके दिखाए मार्ग पर चलने और शिक्षा व समाज सुधार के कार्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। पूरा माहौल उनके महान व्यक्तित्व की याद में भावनात्मक और गंभीर बना रहा।